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राजा राज राजेश्वर सिंह

परिवार एवं विरासत

झंडी राज अवध के खीरी जनपद का एक पुराना राजपूत राज-परिवार है। इसका इतिहास उस चौहान पूर्वज से शुरू होता है जो मुग़ल काल में इस क्षेत्र में आ बसे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में राजा रघुबर सिंह तक पहुँचता है, जिनके भूमि-दान लखनऊ में आज भी याद किए जाते हैं।

अन्तर्वेद आश्रम
2,200 एकड़
झंडी पार्क
लखनऊ
खीरी और उसके बाहर
मंदिर

चौहान वंश से खीरी तक

  1. चौहान वंश

    यह परिवार सोनगरा चौहानों की एक शाखा है, जिसका नाम मारवाड़ के जालवर स्थित सोहनगढ़ के किले से जुड़ा है। खीरी में बसने के बाद यह परिवार जंगरा चौहान के नाम से जाना गया।

  2. खीरी में बसावट

    इस रियासत के पहले पूर्वज अखैराज सिंह अजमेर की ओर से आए चौहान थे और जहाँगीर के समय खीरी में बसे। उनके या उनके पौत्र चतुर्भुज सिंह के दक्कन के युद्ध में पराक्रम दिखाने पर उन्हें भूमि और ‘जंगजेज़ खाकानी राजा’ की उपाधि मिली, जिससे ‘जंगरा’ नाम प्रचलित होना बताया जाता है।

  3. लालपुर से झंडी राज तक

    राजा रणजीत सिंह के पुत्र राजा लालता सिंह झंडी से लगभग तीन किलोमीटर दूर लालपुर में रहते थे, जहाँ उनकी कोठी और ज़मींदारी थी। उन्होंने झंडी राज और मजगई रियासतों की स्थापना की। उनके तीन पुत्र थे: राज देवी बख़्श सिंह, राजा रघुबर सिंह और राज मंगल सिंह। इनमें राजा रघुबर सिंह झंडी राज के राजा बने।

राजा रघुबर सिंह

1876 – 1932

राजा राज राजेश्वर सिंह के परदादा

राजा रघुबर सिंह का जन्म 1876 में हुआ। उनका पालन-पोषण झंडीपुरवा में राजपूती परंपरा के अनुसार हुआ। घर पर उन्होंने फ़ारसी और संस्कृत सीखी और बाद में अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए उन्हें लखीमपुर के सरकारी हाई स्कूल भेजा गया।

पारिवारिक ज़िम्मेदारियों ने जल्द ही उन्हें पढ़ाई से हटाकर संपत्ति के मुक़दमे की ओर मोड़ दिया। मल्लानपुर के राजा देवी बख़्श सिंह की पत्नी रानी पार्वती कुँवर ने अपने पिता राज मिलाप सिंह की उत्तराधिकारी होने का दावा करते हुए पूरी रियासत के विरुद्ध दीवानी वाद दायर किया था। मामला प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति तक पहुँचा और अंततः उनके पक्ष में तय हुआ।

तत्कालीन सरकार ने उन्हें ऑनरेरी मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए, ‘राज’ की उपाधि को मान्यता दी और परिवार के प्रतिनिधि के रूप में दरबार में स्थान दिया। तनिरा के कछवाहा सरदारों और शिमला की पहाड़ियों के केओंथल परिवार समेत कई राजपूत घरानों से उनके वैवाहिक और पारिवारिक संबंध थे।

भूमि-दान के लिए जाना जाने वाला घराना

परिवार के अपने इतिहास में दर्ज दान का विवरण।

मंदिर

परिवार ने अपने क्षेत्र और उसके बाहर अन्य जनपदों में भी मंदिर बनवाए और इन मंदिरों को सैकड़ों एकड़ भूमि दान की। पारिवारिक विवरण में जिन मंदिरों का नाम आता है, वे हैं:

  • अन्तर्वेद, बैरिया के निकट
  • जंगलीनाथ, लखाही के निकट
  • शिव-पार्वती, थरवरनगंज, लखीमपुर
  • रामजानकी, अलीगंज क्रॉसिंग के निकट, गोला गोकर्णनाथ
  • भ्रूण मंदिर, रामधार के निकट, अयोध्या

अन्तर्वेद आश्रम

लगभग 1925–30 के बीच राजा रघुबर सिंह ने अन्तर्वेद आश्रम को क़रीब 2,200 एकड़ भूमि दान में दी।

झंडी पार्क, लखनऊ

राजा रघुबर सिंह ने राजधानी लखनऊ में लालबाग के सामने की एक बड़ी भूमि नगर निगम को जनहित में दान की, ताकि वहाँ आने वाले लोगों को बैठने की जगह मिल सके। यह स्थान आज भी ‘झंडी पार्क’ कहलाता है। 24 अक्टूबर 2000 को लखनऊ नगर निगम ने इस पार्क में राजा रघुबर सिंह की प्रतिमा स्थापित की।

अन्य समुदायों के लिए भूमि

मंदिरों के साथ-साथ परिवार ने झंडी राज के बाज़ार बाग़ में मस्जिद के लिए, हरसिंहपुर में करबला के लिए और गोविंदपुर-लुधौरी के रानी फार्म में गुरुद्वारे के लिए भी भूमि दान की।

राजा रघुबर सिंह के बाद

राजा रघुबर सिंह के निधन के बाद उनके दूसरे पुत्र कुँवर राज बहादुर सिंह राजा बने। बड़े पुत्र राजकुमार इक़बाल बहादुर सिंह का निधन 1936 में सत्रह वर्ष की आयु में हो चुका था। राजा राज बहादुर सिंह का जून 1945 में निधन हुआ, जिसके बाद उनकी धर्मपत्नी ने रियासत का कार्यभार सँभाला।

किला आज

झंडी राज का किला आज भी खीरी जनपद के झंडी में मौजूद है, जो निघासन तहसील से लगभग पाँच किलोमीटर दक्षिण में है। अब यह एक छोटा कस्बा रह गया है।

स्रोत: यह विवरण एक हिंदी स्थानीय इतिहास-पुस्तक, अवध के तालुक़दारों पर एक अंग्रेज़ी विवरण और परिवार के अपने मुद्रित परिचय पर आधारित है।